हर रंग हमारा सुंदर है


रंगों पर तो रहम करो यह रंग तो सारे सुंदर हैं 

लाल हरा नीला केसरिया, सब श्रृंगार मनोहर  हैं 

रंगों का कुछ धर्म नहीं है, जात नहीं समुदाय नहीं 

सब की आँखो में सज जाते, मन में कुछ अन्याय नहीं 

रंगों से यूँ अर्थ ना बाँधो, हर्ष शोक मैं रंग ना बाँटो 

सूरज से सब साथ मैं आए इनका यह प्रसंग ना बाँटो 

भिन्न सुरों का सार सुरीला, काला गोरा लाल व पीला 

मिलने जुलने से होता है मानवता का रंग रंगीला 

रंगों का प्रसंग है धरती, धरती कब इक रंग से सजती 

पत्ते फूल कली और कोंपल, वृक्ष अंग भी भाँति भाँति 

इंद्र्धनुश की श्रोत एक है, हर जीवन की ज्योत एक है 

आँखों मैं गर मैल ना हो तो, विविदताओं की हौद एक है 

शिक्षक और भगवान

यह आदर प्रेम का अंत ना हो

यह भाव अति अत्यंत ना हो

जो श्रद्धा अत्याचार बने

जो दूर करे दीवार बने

तुम वो सम्मान नहीं करना

मुझको भगवान नहीं करना

 

शिक्षक शोषण का चालक हूँ

नायक हूँ या खलनायक हूँ

क्या मैं ही चरित्र का रक्षक हूँ?

क्या मैं केवल ऎक शिक्षक हूँ ?

मैं भी तुम जैसा प्राणी हूँ

सत्ता से घमंडित होता हूँ

षड्यंत्र में मिश्रित होता हूँ

झूटों से प्रेरित होता हूँ

हर पाप से पीङिट होता हूँ

हाँ मैं प्रदूषित होता हूँ

यह पावॅ फिसलते देखो तो

हाँ रूप बदलते देखो तो

ख़ुद को हैरान नहीं करना

मुझ को भगवान नहीं करना

 

आदर्श तुम्हारा विषय सही

मैं शोध विधि का दृश्य सही

जब ज्ञान मेरा भी सीमित हो

क्यूँ चूक मुझी पर वर्जित हो

घर मेरा जीवन मैं ले कर

स्थल निर्माण नहीं करना

मुझ को भगवान नहीं करना

 

हाँ मानवता का मंथन हूँ

पर वस्तु नहीं एक जीवन हूँ

है श्रोत बढ़ी, मैं बस धारा

है आग बढ़ी मैं अंगारा

कोई तर्क बिना संदर्भ नहीं

शिक्षक शिक्षा का विकल्प नहीं

ज्ञानी को ज्ञान नहीं करना

मुझको भगवान नहीं करना

 

तुम एकलव्य हो अर्जुन हो

अपने आवेग का अर्पण हो

यह विद्या मेरा ऋण नहीं

यह संस्था मेरी श्रण नहीं

जीवन का समर्पण माँगूँ तो

चिंतन का यह दर्पण माँगूँ तो

तुम ऎसा दान नहीं करना

मुझको भगवान नहीं करना

Ghazal (mullah aur mulhid)

 

غزل

ملّا سے ملا تو دین گیا ملحد سے ملا بے دینی گئی
اس دورِتجارت میں مجھ سے ہر سوچ کی دولت چھینی گئی

جب مفلس تھاآزادتھا میں ناچیز تو تھا خوددار بھی تھا
مسند کے لئے ایمان گیا رتبوں کےعوض خود بینی گئی

میں بے حس تھاحساس نہ تھا ہر دعوئِ عشق پہ ہںستا تھا
جب سر پر میرے  سنگ گرا تو اس دل کی سنگینی گئی

مظلوم کے آنکھ چرانے پر کب ظالم ظلم سے رکتا ہے
اس دشت میں بزدل جدھر گیا صیاد گیا گل چینی گئی

کچھ اپنے عقیدوں کی شدت یوں حاکم پر معمور ہوئی
قانون گیا انصاف گیا ہر رسم و رہِ آئینی گئی

Romanized and Translation:

Mullah se mila to deen gaya, mulhid se mila be deeni gayee,
Is daur-e-tijarat mein mujh se, har soch ki daulat chheeni gayee.
Robbed of faith by the preacher and lost my failthlessness to the non-believer,
In the culture dominated by trade, I was deprived of every grain of genuine thought.
Jab muflis tha aazad tha mein, na-cheez to tha, khud dar bhi tha,
Masnad ke liye eeman gaya, rutbon ke iwaz khud beeni gayee.
I was more free when I was poor, my nothingness was my pride,
I gave up my faith to get to lead the congregation, and was blinded to introspection for the sake of acquiring ranks in power.
Mein be-his tha has’sas na tha, har daawa’e ishq pe hansta tha,
Jab sar par mere sang gira, to is is dil ki sangeeni gayee.
I was insensitive and not respectful to others, as I laughed at every claim of the lovers,
My stoniness was gone when a pebble hit my own head.
Mazloom ke aankh churaane se, kab zalim zulm se rukta hey,
Is bazm mein buz-dil jidhar gaya, sayyad gaya, gul cheeni gayee.
When the victim looks the other way, the cruel doesn’t cease his fury,
Wherever the coward goes, go the predators and robbers.
Kuchh apne aqeedon ki shiddat, yun hakim par ma’moor hui,
Qanoon gaya, insaaf gaya, har rasm-o-rah-e-aa’eeni gayee.
The intensity of faith took over the rulers in such a way that,
He gave up justice and every bit of constitutional tradition.

सब तो अपने हैं (ग़ज़ल)

किस को किस का हक़ दिलवाएँ, सब तो आख़िर अपने हैं ।
दीवानों को क्या समझाएँ, सब तो आख़िर अपने हैं ।

धर्म जात के रक्षक थे वो हृदयहीन सत्यवादी।
हम देखें और चुप हो जाएँ, सब तो आख़िर अपने हैं ।

बाँट रहे हो घर को तो फिर, सरहद चाहे जहाँ बनाओ।
रिश्तों को अब क्या नपवाएँ, सब तो आख़िर अपने हैं ।

चोरी चक्यारी के धन को मेहनत का फल कहते हैं ।
क्यूँ हम बातों में ना आएँ, सब तो आख़िर अपने हैं ।

उस ने हम को दुश्मन कहकर दोष रखा, अपमान किया
हम ख़ुद को अब भी समझाएँ, सब तो आख़िर अपने हैं ।