सब तो अपने हैं (ग़ज़ल)

किस को किस का हक़ दिलवाएँ, सब तो आख़िर अपने हैं ।
दीवानों को क्या समझाएँ, सब तो आख़िर अपने हैं ।

धर्म जात के रक्षक थे वो हृदयहीन आदर्शवादी ।
हम देखें और चुप हो जाएँ, सब तो आख़िर अपने हैं ।

बाँट रहे हो घर को तो फिर, सरहद चाहे जहाँ बनाओ।
रिश्तों को अब क्या नपवाएँ, सब तो आख़िर अपने हैं ।

चोरी चक्यारी के धन को मेहनत का फल कहते हैं ।
क्यूँ हम बातों में ना आएँ, सब तो आख़िर अपने हैं ।

उस ने हम को दुश्मन कहकर दोष रखा, अपमान किया
हम ख़ुद को अब भी समझाएँ, सब तो आख़िर अपने हैं ।